ठाकुर जी भोले हैं

ठंडे पानी से नहलातीं, ठंडा चंदन इन्हें लगातीं, इनका भोग हमें दे जातीं, फिर भी कभी नहीं बोले हैं। माँ के ठाकुर जी भोले हैं।  

क्यों जीता हूँ

आधे से ज़्यादा जीवन जी चुकने पर मैं सोच रहा हूँ- क्यों जीता हूँ? लेकिन एक सवाल अहम इससे भी ज़्यादा, क्यों मैं ऎसा सोच रहा हूँ? संभवत: इसलिए कि जीवन कर्म नहीं है अब चिंतन है, काव्य नहीं है अब दर्शन है। जबकि परीक्षाएँ देनी थीं विजय प्राप्त करनी थी अजया के तन मन… Continue reading क्यों जीता हूँ

अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?

आँधी आई जोर शोर से, डालें टूटी हैं झकोर से। उड़ा घोंसला अंडे फूटे, किससे दुख की बात कहेगी! अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी? via अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी? – महादेवी वर्मा — Kayvashaala

ज़िंदगी हमे ये कहाँ ले आयी ?

ज़िंदगी हमे ये कहाँ ले आयी ? खुश थे जहाँ से ले आयी | गुज़रे दिनों की धुप थी क़बूल, क्यों बारिश कहाँ से ले आयी ? किसी अटके हुए पल की तरह | किसी माथे की बल की तरह | किसी सवाल-ए-बेहाल की तरह| किसी जले हुए काल की तरह | गोया खींच के… Continue reading ज़िंदगी हमे ये कहाँ ले आयी ?

Race of life

सरपट सी भागती ये ज़िन्दगी, अब और तेज भागने लगी है, रफ़्तार मिलाने की कोसिस करती हूं मैं, पर फिर भी ये आगे निकलने लगी है । हवा सा उड़ता हुआ ये वक्त , अब धुंए सा उड़ने लगा है, लम्हो को बचाने की कोशिस करती हूं मैं, पर फिर भी ये कुछ आगे निकलने… via… Continue reading Race of life

सुखन – महाराष्ट्र टाईम्स 5 एप्रिल

महाराष्ट्र टाईम्स, 05.04.2018 (सुख़न – 14) शाळेत असताना निबंधांमधे ’वृत्तपत्राचे आत्मकथन’ वगैरे विषय असत आणि निबंध लिहीताना तो परिपूर्ण असावा म्हणून त्यात म्हणी, वाक्प्रचार वापरून मुद्दे अधोरेखीत केले जावेत असा अभ्यास घेणाऱ्या आजोबांचा कल होता. वृत्तपत्राच्या आत्मकथनासाठी त्यांनी एक शेर सांगितला होता, खींचो न कमानों को न तलवार निकालो जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार […]… Continue reading सुखन – महाराष्ट्र टाईम्स 5 एप्रिल

काठोकाठ भरलेले सुख आता घागरीत भरता येईल — abolichyakalya

त्या वहात्या पाण्याचा खळखळाट ऐकला तर याचा नाद प्रत्येक वेळी वेगळा आवाजाला ही अर्थ असतो स्थळकाळ परत्वे बदलत हा बोध रिमझिमपावसात नाद पानावरचा तो नेमका बदलला रिपरिपत्या पावसात मुसळधार ही तो गर्जतो नाद मिसळतो छपरावरुन गळणारे पाण्याचा मग जात कुठं ओलेत्या पाण्याचा डोक्यात मुरलेल्या शिंकांबरोबर येणारा ठणकणारे डोक्यात घुमणारा अन् तेच तूषार झटकल्याचा उत्साही नाद […]… Continue reading काठोकाठ भरलेले सुख आता घागरीत भरता येईल — abolichyakalya

Agastya Kapoor की दुनिया

ख़ुदा-ख़ुदा क्या करते हो ? ख़ुदाखाने में आओ तो सही | ये तो इबादत का एक तरीका है, तुम मैखाने आओ तो सही | हम बहा देंगे दरिया तुम्हारे लिए, तुम भी वो ज़माने लाओ तो सही | ये भी खुदा की ही ईजाद है, तुम भी ये निवाला खाओ तो सही | तुम्हारी भी […]… Continue reading Agastya Kapoor की दुनिया

Paper and pen…… — Lifewithwordssite

छोटी छोटी खुशियां ढूंढती हूं मैं, इस विशाल वक्त के समंदर में, जैसे गोताखोर ढूंढता है मोती, एक विशाल गहरे समंदर में । उड़ती चली जाती हूं वक्त के साथ मैं, इस आसमान की ऊंचाई की तलाश में, ना जाने कब वो मंजर आएगा, मैं हूँ कब से जिसकी तलाश में । इन आँखों ने […]… Continue reading Paper and pen…… — Lifewithwordssite